व्यापमं जैसा आउटसोर्स घोटाला, घोटालेबाजों को खुल्लम खुल्ला संरक्षण, सरकार की साख को बट्टा
हरीश चन्द्र कुशवाह
ग्वालियर।
नगर निगम में मोटी रकम लेकर बेरोजगार युवाओं की फर्जी भर्ती का घोटाला व्यापमं कांड जैसा है। आउटसोर्स कर्मचारी भर्ती घोटाले की हर रोज नये-नये खुलासे हो रहे हैं, किंतु नगर निगम के मुखिया आयुक्त किशोर कान्याल घोटालेबाजों को खुल्लम खुल्ला संरक्षण दे रहे हैं। दिखावे की जांच कमेटी बनाने से यह आशंका परवान चढ़ने लगी है कि कोयले की दलाली में उनके भी हाथ काले हैं। घोटालेबाजों को संरक्षण देकर वे प्रदेश के मुखिया शिवराज सिंह चौहान के सुचिता व भ्रष्टाचार मुक्त मध्यप्रदेश बनाने के प्रयासों को चोट पहुंचा रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर व ज्योतिरादित्य सिंधिया की साख को भी धूमिल कर रहे हैं।
हर अखबार दौड़ पड़ा, लेकिन असर नहीं हुआ
हम खबर ज्यादा नहीं लिख रहे। केवल प्रदेश के प्रमुख अखबारों के अभियान की खबरें आपको बता रहे हैं। इतने बड़े घोटाले को समाचार-पत्र सुर्खियां बना रहे हैं। केवल विष्णु पाल और विशाल जाटव को सस्पेंड कर दिया, जिनका कोई धनी धोरी नहीं है। घोटाले के जाल में अपर आयुक्त मुकुल गुप्ता, अतेन्द्र सिंह गुर्जर, उपायुक्त प्रदीप श्रीवास्तव, अतिबल सिंह यादव के अलावा प्रभाकर द्विवेदी, धर्मेन्द्र भदौरिया, मयंक श्रीवास्तव भी फंसे नजर आ रहे हैं, सबूत चीख रहे हैं, फिर भी मजाल है कि घोटालेबाजों का बाल बांका भी हो जाये।
लुटिया डुबो दी फिर भी चेहरे पर मुस्कुराहट
57 साल बाद नगर सरकार से भाजपा की कुर्सी छिनी है। इसका एक बड़ा कारण मतदाता पर्ची वितरण में गड़बड़ी था। पहली बार पर्ची वितरण की जिम्मेदारी नगर निगम ने अपने हाथ ली और पहली ही बार में लुटिया डुबो दी। इसके बाद भी निगम के जिम्मेदारों के चेहरों पर खिलखिलाहट है।
दूध की धुली नहीं हैं एजेन्सियां
आउटसोर्स घोटाले में भले ही राज सिक्योरिटी, सेंगर सिक्योरिटी और शर्मा सिक्योरिटी अपनी सफाई देकर बचने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन यदि एक-एक बिन्दु की जांच हुई तो तीनों एजेन्सियों का बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हो जाएगा।
कंगाली में आटा गीला
आउटसोर्स भर्ती कांड का सबसे पीड़ादायक पहलु यह है कि बेरोजगारों को झांसा देकर 50 हजार से लेकर डेढ़ लाख रुपये तक लिये गये हैं। किसी ने पत्नी के गहने गिरवी रखे हैं तो किसी ने मकान को सूदखोरों को दिया है। निगम को यदि कर्मचारियों की आवश्यकता थी तो नियमों के तहत रोजगार कार्यालय से नाम लिये जाते या फिर समाचार-पत्रों में विज्ञापन जारी करते। इससे योग्य लोगों को मौका मिलता। लेकिन निगमायुक्त किशोर कान्याल ने स्वच्छता सर्वेक्षण की आड़ में अपने अधीनस्थों को लूट का खुला संरक्षण देकर घोटाले को परवान चढ़ा दिया।









