सरकारी जमीन मामले में प्रशासन की घोर लापरवाही: कोर्ट में एकपक्षीय हुआ शासन, सरकारी वकील के रवैये पर उठे सवाल

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शासकीय भूमि के मामले में प्रशासन की घोर लापरवाही: कोर्ट में एकपक्षीय हुआ शासन, सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा के रवैये पर उठे सवाल

ग्वालियर जिले में बेशकीमती शासकीय जमीनों को भू-माफियाओं और निजी हितों से बचाने का जिम्मा संभालने वाले सरकारी तंत्र की एक बड़ी लापरवाही सामने आई है। ग्राम लखनौती कलां (तुरारी, ग्वालियर) स्थित विवादित और अहस्तांतरणीय शासकीय भूमि से जुड़े एक महत्वपूर्ण दीवानी मामले में मध्य प्रदेश शासन (कलेक्टर ग्वालियर) न्यायालय में एकपक्षीय (Ex-Parte) हो गया. इस घोर लापरवाही के चलते न्यायालय ने शासन के खिलाफ अंतरिम स्थगन (स्टे) आदेश जारी कर दिया है. इस पूरे घटनाक्रम के बाद शासकीय अधिवक्ता (सरकारी वकील) विजय कुमार शर्मा की कार्यप्रणाली और कर्तव्यनिष्ठा पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्या है पूरा मामला?

सत्रहवें जिला न्यायाधीश ग्वालियर (न्यायाधीश रवि शंकर दोहरे) की अदालत में विचाराधीन प्रकरण क्रमांक RCSA 1254/2025 (काव्य आनंद व अन्य बनाम कलेक्टर सिंह गुर्जर व अन्य) में ग्राम लखनौती कलां की कुल 13 सर्वे नंबरों की 2.3827 हेक्टेयर भूमि को लेकर विवाद चल रहा है. वादीगण (काव्य आनंद, सतीश कक्कड़, नवीन जैन) ने इस भूमि को खरीदने का अनुबंध होने का दावा करते हुए न्यायालय से स्थाई निषेधाज्ञा की मांग की थी.

इस मामले में प्रतिवादी क्रमांक 12 के रूप में मध्य प्रदेश राज्य (द्वारा कलेक्टर जिला ग्वालियर) को पक्षकार बनाया गया था. विवादित भूमि में से सर्वे क्रमांक 137/1और 141/1को राजस्व अभिलेखों में स्पष्ट रूप से ‘अहस्तांतरणीय’ (शासकीय/प्रतिबंधित प्रकृति) का बताया गया है.

जवाब तक पेश नहीं कर पाए सरकारी वकील

अदालत द्वारा जारी आदेश दिनांक 30 जून 2026 से यह सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि शासन (कलेक्टर ग्वालियर) की ओर से मामले की पैरवी कर रहे सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा अदालत में शासन का पक्ष रखने में पूरी तरह नाकाम रहे. न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया है कि:

 

> “प्रतिवादी क्रमांक 12 (म.प्र. राज्य) :- एकपक्षीय।”

> > “प्रतिवादी क्रमांक 11 एवं 12 ने उक्त आवेदन पत्र का लिखित जवाब प्रस्तुत नहीं किया है।”

> जब एक तरफ निजी प्रतिवादियों के वकीलों ने कोर्ट में मुस्तैदी से जवाब पेश किए, वहीं शासकीय वकील की निष्क्रियता के कारण शासन का पक्ष शून्य रहा. इसका सीधा फायदा वादी पक्ष को मिला और अदालत ने मामले के अंतिम निराकरण तक विवादित शासकीय सर्वे नंबरों सहित कुल 1.6307 हेक्टेयर भूमि के अंतरण (Transfer) पर रोक लगा दी है.

### **लापरवाही या कोई दुरभिसंधि? उठ रहे हैं गंभीर सवाल**

करोड़ों रुपए मूल्य की शासकीय और अहस्तांतरणीय भूमि से जुड़े मामले में सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा का यह रवैया कई गंभीर सवाल खड़े करता है:

1. एकपक्षीय क्यों होने दिया?: जब शासकीय हितों की रक्षा के लिए शासन ने अधिवक्ता नियुक्त किया है, तो कोर्ट में समय पर जवाब क्यों दाखिल नहीं किया गया?

2. वरिष्ठ अधिकारियों को क्यों नहीं दी सूचना?: क्या इस गंभीर मामले की जानकारी जिला कलेक्टर या विधि विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई थी? यदि हाँ, तो पैरवी में इतनी ढील क्यों बरती गई?

3. लापरवाही की जिम्मेदारी किसकी?:

शासकीय भूमि पर कोर्ट का स्टे आ जाना और शासन का डिफेंस में न उतरना सीधे तौर पर शासकीय वकील की विफलता को दर्शाता है।

सूत्रों का कहना है कि इस प्रकार की विधिक लापरवाही से न केवल शासकीय संपत्तियों पर संकट मंडराता है, बल्कि भू-माफियाओं के हौसले भी बुलंद होते हैं। सजग नागरिकों और विधि विशेषज्ञों ने इस मामले में जिला प्रशासन से तुरंत हस्तक्षेप करने और शासकीय वकील विजय कुमार शर्मा की भूमिका की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है, ताकि भविष्य में सरकारी जमीनों की पैरवी में ऐसी अक्षम्य ढील न दी जा सके।

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