अंधेरगर्दीः 45 साल में 6 लोगों को बेची दुकान, अब पासा पलटा

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जिम्मेदार अधिकारियों की मिलीभगत से चलता है खेल

हरीश चन्द्रा, ग्वालियर।

वैध हो या अवैध, नगर निगम में कोई भी काम कराना अब कठिन नहीं है। किसी भी विभाग की फाइल के पन्ने पलट लीजिये, कहीं न कहीं काले धब्बे नजर आ जाएंगे। पिछले दिनों एक और अजूबा सामने आया है। मामला राजस्व विभाग का है। हुजरात मार्केट में दुकान नंबर 56 की कहानी जब आप पढ़ेंगे तो समझ जाएंगे कि 45 साल में लक्ष्मी जी ने कितने दरवाजे पर दस्तक दी है। 45 साल में यह दुकान 6 लोगों को मालिक(शिकमी किरायेदार) बना चुकी है। अब नगर निगम के फैसले की बात करें तो पिछले दिनों इसका असली मालिक उसे माना गया जो 45 साल पहले थे। अब यह सवाल मत पूछिएगा कि इस पूरे मामले में मुंसीपाल्टी के जिम्मेदारों की क्या भूमिका है।

पूरी कहानी, कागजों की जुबानी

हुजरात पुल सब्जी मंडी पर नगर निगम की मार्केट थी। निगम के दस्तावेजों के अनुसार दुकान नंबर 6 को 1977 में रविकांत द्विवेदी को आवंटित की थी। 1990 में यह लक्ष्मीनारायण भिलवार, 1994 में राकेश वर्मा, 1996 में रविराज चौहान, फिर संतोष किरार, साल 2000 में बाबू और 2021 में यह ममता पत्नी प्रेमबाबू प्रजापति पर पहुंच गई। इस बीच कुछ मालिकों ने नामांतरण के लिए निगम में रुपए भी जमा कर दिये। यह सब राजस्व शाखा के जिम्मेदारों की देखरेख में होता रहा।

अब आया नया मोड़

हुजरात पुल पर दुकानें खड्डर हो चुकी थीं। अब वहां नई मार्केट बन रही है। दुकान की कीमत अब आसमान छू रही है। ममता और प्रेमबाबू प्रजापति ने निगम में नामांतरण के लिए पैसे जमा किये और समाचार-पत्र में विज्ञप्ति निकलवाई। इसी बीच 45 साल पुराना मालिक रविकांत द्विवेदी सामने आ गया और बोला कि उन्होंने दुकान कभी किसी को बेची ही नहीं है। उनके पिता ने दयाभाव दिखाते हुए संबंधित को सामान रखने के लिए दुकान दे दी थी। अपर आयुक्त व अपीलीय अधिकारी अतेन्द्र सिंह गुर्जर ने अपना फैसला रविकांत के पाले में कर दिया है, लेकिन सवाल वहीं खड़ा रह गया है कि अब तक जिम्मेदार अधिकारियों ने आंख बंद क्यों कर रखी थी।

इनका कहना है

हुजरात पुल की दुकान का मामला क्या है, फाइल देखकर ही कुछ कहा जा सकताहै।

अतेन्द्र सिंह गुर्जर, अपर आयुक्त राजस्व

 

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