वैचारिक मतभिन्नता का वीभत्स रूप 

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(विचार मंथन) 
वैचारिक मतभेद का वीभत्स रूप भारत के घर-घर में देखने को मिल रहा है। वैचारिक मतभेद अब हिंसा के रूप में बदल रहा है। पहले धार्मिक आधार पर वैचारिक मतभेद को हिंसा का वातावरण बनाया गया। अब यह किसी भी विषय में मतभेद होने पर लोग हिंसा पर उतारू होने लगे हैं।

पहली बार भारत में इसका वीभत्स रूप देखने को मिल रहा है। धार्मिक और राजनीतिक आधार की मत भिन्नता के बाद भी हम हजारों सालों से शांतिपूर्वक रहते आए हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में हमारी सामाजिक एवं व्य‎‎क्तिगत संवेदनशीलता पूरी तरह से खत्म होती जा रही है। धार्मिक एवं राजनीतिक आधार पर मत भिन्नता को लेकर जो हिंसक घटनायें सामने आ रही थीं, अब उसका परिणाम घर-घर में दिखने लगा है। अब हर व्यक्ति की आदत पड़ती जा रही है, कि लोग उसके हिसाब से कार्य करें। जब तक यह ‎स्थिति राजनीतिक और धार्मिक आधार पर थी, तब तक इसका बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ा था। अब यह फर्क घर-घर में देखने को मिलने लगा है। लोग अपनी जिम्मेदारियां भूल कर घर और परिवार में भी अपने विचारों के अनुसार सारे लोगों को चलाना चाहते हैं। जिसके कारण घर घर में झगड़े होना शुरु हो गए हैं।

पिछले एक दशक में जिस तरह से लोगों की आक्रामकता बड़ी है। उसके कारण अब मनोविशेषज्ञों को भी चिंता होने लगी है। घर के लोग परेशान होने लगे हैं। पारिवारिक रिश्ते में तल्खी आने लगी है। परिवारों में भी हिंसक होने की घटनाएं बड़ी तेजी के साथ बढ़ रही हैं। मनो‎चि‎कित्सकों के पास प‎‎त्नियां अपने प‎ति और बच्चों को लेकर पहुंच रही हैं। उनके प‎ति और बच्चे ‎पिछले कुछ वषों में बड़ी तेजी से धा‎र्मिक हो रहे हैं। पा‎रिवा‎रिक ‎‎जिम्मेदा‎रियों के स्थान पर उनका ज्यादा समय धा‎र्मिक गुरुओं, मो‎टिवेशनल स्पीकर एवं उत्तेजक राजनेताओं के वी‎डियो देखने के आदी हो गए हैं। वह आक्रामक भी हो रहे हैं। को‎विड के बाद यह मामले तेजी के साथ बढ़ रहे हैं।

बिना कुछ किए बहुत कुछ पाने की लालसा हमें आत्मनिर्भर की जगह दूसरों के ऊपर आश्रित रहने की प्रवृत्ति को बढ़ा रही है। इसमें सबसे सबसे बड़ी भूमिका धार्मिक आधार देवी-देवताओं, राजनेताओं, सरकारों पर आश्रित हो जाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इस कारण सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों से लोग दूर होते जा रहे हैं। लोग भगवान भरोसे अथवा सरकार के भरोसे रहने के आदी होते जा रहे हैं। इसका असर पढ़ने वाले बच्चों पर भी पड़ रहा है। हर बात के लिए भगवान और सरकार के सामने गुहार लगाकर, यह मान लेते हैं कि हम जो कर सकते थे, वह कर लिया। जिसके कारण अब परिवारों में बिघटन की स्थिति ‎दिखने लगी है। पति-पत्नी और बच्चों के रिश्ते खराब हो रहे हैं।

घर का मुखिया असंवेदनशील होकर धार्मिक आधार पर समर्पित हो गया है। वह अपनी जिम्मेदारियों को भूलता जा रहा है। मनो-चिकित्सकों के पास इस तरह के मरीज आ रहे हैं। जो अपना अधिकांश समय टेलीविजन और मोबाइल पर धार्मिक डिबेट, मोटिवेशनल डिबेट और इंटरनेट की आभासी दुनिया से जुड़कर सपनों में खोए रहते हैं। वह अपनी बेरोजगारी और व्यवसाय की असफलता से हतोत्साहित होकर भगवान और सरकार के भरोसे बैठने के लिए आदी हो रहे हैं। उनका व्यवहार बदल रहा है। परिवार के आर्थिक और सामाजिक रिश्ते बिगड़ रहे हैं। पति पत्नी और बच्चों के संबंधों में भी इसका असर देखा जा रहा है। हर जगह असंवेदनशीलता और उग्रता बढ़ रही है। डर भय और लालच बढ़ता जा रहा है। कोई भी व्यक्ति एक दूसरे के विचार का सम्मान करने के लिए तैयार नहीं है। मनो चिकित्सकों के अनुसार हर व्यक्ति अपने विचारों के अनुसार चलाने की जो प्रवृत्ति समाज एवं प‎रिवार में बन रही है। उसके कारण सारी समस्याएं खड़ी हो रही है।

राजनीतिक एवं धार्मिक आधार पर पिछले एक दशक में बड़ी तेजी के साथ वैचा‎रिक हिंसा बढ़ी है। विचारधारा के आधार पर लोग हिंसक होने लगे हैं। समान विचारधारा नहीं होने पर लोग हिंसक होकर उसका विरोध करने लगते हैं। जिसके कारण इसका असर प्रत्येक परिवार में पड़ता हुआ दिख रहा है। जिस तरह से भारत में महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक संकट से लोगों को गुजारना पड़ रहा है। उसके कारण यह तनाव और भी ज्यादा बढ़ रहा है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान मोबाइल के कारण हो रहा है। मोबाइल और इंटरनेट के जरिए सारी जानकारी और सूचनाएं मोबाइल पर आ रही हैं।

लोग अपना काम धाम छोड़कर सबसे ज्यादा समय मोबाइल पर बिता रहे हैं। काम करने और सोचने की प्रवृत्ति बड़ी तेजी के साथ खत्म हो रही है। जो मोबाइल पर देखते और सुनते हैं। उसके अनुसार उनकी प्रवृत्ति बनना शुरू हो जाती है। मोबाइल एडिक्शन के साथ-साथ अब विचारों का एडिक्शन भी भारतीय परिवारों को तेजी के साथ तनाव और ‎हिंसा की ओर ले जा रहा है। सामाजिक प्रेम की जगह सामाजिक एवं पा‎रिवा‎रिक विद्वेष हर परिवार में देखने को ‎मिल रहा है। व्यक्ति का स्वयं का अहं शिखर पर आ गया है। जिसके कारण भारतीय समाज उत्तेजित होता जा रहा है। परिवार और समाज में दायित्व और प्रेम खत्म हो रहा है, यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है। जहां प्रेम होगा, वहीं विकास हो सकता है। जहां हिंसा होगी, वहां विध्वंस होना तय है। यह सभी को समझना होगा।

 

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