जीवाजी विश्वविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का हुआ शुभारंभ
ग्वालियर ।
मुख्य वक्ता शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास के क्षेत्र संयोजक जगराम ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य इन तीन बातों पर निर्भर करता है ज्ञान, कौशल और चरित्र। नई शिक्षा नीति के अंतर्गत इन तीन गुणों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि चरित्रवान छात्र एवं शिक्षक ही भारत के ज्ञान का आधार बन सकता है। भारत में शिक्षा एक दर्शन है। यह बात उन्होंने आज जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में बतौर मुख्यवक्ता के रूप में कही।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाश तिवारी द्वारा कार्यक्रम ने कहा कि हमें शिक्षक छात्र का कान्सेप्ट समाप्त करते हुए पुरानी गुरू शिष्य की पंरपरा को चलन में लाना होगा। शिक्षा अंक गुणात्मक पद्धति है। छात्रों को अपने अकेडमी प्रोफाइल के साथ साथ प्रोफेशनल प्रोफाइल को भी विकसित करना चाहिए। कार्यक्रम का संचालन डॉ. कल्पना कुशवाह एवं डॉ. पदमा शर्मा ने किया। कार्यक्रम का आभार आयोजन संयोजक डां.राजेन्द्र वैध ने किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता जीवाजी विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाश तिवारी ने की। जबकि विशिष्ठ अतिथि के रूप में आईटीटीएम के निदेशक प्रो. आलोक शर्मा एवं आईटीएम यूनिवर्सिटी के कुलपति दौलत सिंह मौजूद थे।

इससे पूर्व अतिथियों द्वारा सरस्वती चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। कार्यक्रम का स्वागत भाषण आयोजन सचिव प्रो. हेमंत शर्मा ने दिया।
जीवाजी विश्वविद्यालय के गालव सभागार में शनिवार 15 जुलाई को ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत शैक्षणिक स्वायत्तता प्रावधान एवं संभावना’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ हुआ।
इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत धीरेंद्र सिंह भदौरिया प्रांत संयोजक शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास, विवि के रेक्टर डॉक्टर डीएन गोस्वामी, प्रो. अशोक चौहान, प्रो. एस के द्विवेदी, प्रो. एसएन महापात्रा, कार्यपरिषद सदस्य संगीता कटारे, संजय यादव, डॉ.विवेक भदौरिया, आदि ने किया।
प्रथम सत्र की विशिष्ट अतिथि दुर्गा प्रसाद अग्रवाल ने अपने उद्बोधन में कहा यदि समाज को बदलना है तो शिक्षा में बदलाव जरूरी है और शिक्षा को बदलना है तो शिक्षा को स्वायत्त होना जरूरी है और हमारी शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। इसके बाद दौलत सिंह चौहान कुलाधिपति आईटीएम विश्वविद्यालय के गालव ऋषि को नमन करते हुए कहा कि शिक्षा नीति समय काल, देश को देखते हुए बनाई जाती है। आज के समय की शिक्षा नीति के स्वायत्तता से ज्यादा शिक्षकों की स्वतंत्रता पर बात करना ज्यादा आवश्यक है देश विविधताओं के देश है। इसलिए भारत एक सू सामूहिक शिक्षा सभी के लिए कारगर साबित नहीं हो सकती इसलिए शिक्षकों की स्वतंत्रता आवश्यक है।
वहीं दूसरे सत्र के शुभारंभ में उपस्थित अतिथि डॉक्टर के रत्नम,डॉक्टर खेमचंद उडेरिया, मुख्य वक्ता डॉ रविंद्र कान्हेरे, पंडित साहित्य कुमार नारद एवम अशोक पटेल रहे।
इस अवसर पर अतिथियों का स्वागत कल्पना कुशवाह, डॉक्टर धीरेंद्र शास्त्री, आर.के वाजपेई, बसपति संत डॉ राजेंद्र वैद्य ,डॉ सुशील मुंडेरिया द्वारा किया गया।
डॉक्टर के रत्नम ने अपने उद्बोधन में कहा कि इससे पहले जितनी भी नीतियां बनी वे राष्ट्रीय नहीं थी भारत में शिक्षा उद्धार का माध्यम थी उन्होंने आगे शिक्षा नीति के मूल मंत्र दर्शन संस्कृति एवं इतिहास बताए डॉ. खेमचंद्र ने कहा कि प्राचीन काल में छात्र साधारण जीवन व्यतीत करते थे कहीं उन्होंने कहा की गुडवक्ता के बिना शिक्षा अपने उददेश्यों को प्राप्त नहीं कर पायेगी। इस शिक्षा नीती से अपेक्षा यह है कि यह छात्रों का सम्पूर्ण विकास करे। मुख्य वक्ता डॉ. रविन्द्र कान्हरे ने कहा कि आज जरुरत है कि सारे विश्वविद्यालय अपने अधिकारों का प्रयोग करे विश्वविद्यालय को आवश्यकताा है कि वो क्रेडिट सिस्टम पर ध्यान दे। वहीं अशोक पडेल ने कहा कि विध्यार्थी विद्यालय में शिक्षकों की जीवन शैली से सीखने आते हैं वरना पढऩे के तो और भी तरीके हैं। पी आर ओ डॉ विमलेन्द्र सिंह राठौर ने बताया कि सत्र के समापन पर अतिथीयों को मोमेंटो भेंट किया गया। सत्र का संचालन डॉ. एस. बी.ओझा ने किया।डॉ राठौर ने बताया कि दो दिवसीय कार्यक्रम का समापन कल 16जुलाई को विभिन्न सत्रों के साथ होगा।












