अधिकारियों की लापरवाही से कोर्ट में हारा निगम, अब आयुक्त ने पकड़ा मामला तब फिर चल पड़ी फाइल
@हरीश चन्द्रा, ग्वालियर।
करोड़ों रुपए कीमत की सरकारी जमीनों को खुर्द-बुर्द करने में भाजपा नेताओं के हाथ लंबे होते जा रहे हैं। कहीं अधिकारियों, सरकारी वकीलों की संलिप्लतता सामने आ रही तो कहीं लापरवाही। ऐसा ही एक मामला नगर निगम का सामने आया है जिसमें बारादरी चौराहा मुरार पर सर्वे क्रमांक 2916 की 7312 वर्गफीट करीब 35 करोड़ की नगर निगम की जमीन रसूखदार भाजपा नेता पारस जैन के हाथों में पहुंच गई हैं। मोहनलाल सर्राफ चैरिटेबल ट्रस्ट के ट्रस्टी पारस जैन सहित अन्य के नाम यह वही जमीन है जहां पिछले दिनों रात में आग लगी थी और सूचना पर मप्र विधानसभा अध्यक्ष नरेन्द्र सिंह तोमर, कलेक्टर श्रीमति रूचिका चौहान व निगमायुक्त हर्ष सिंह भी पहुंचे थे। मामला पकड़ में आते ही नगर निगम आयुक्त हर्ष सिंह ने हाई कोर्ट में अपील का आदेश दिया है। देखना है कि निगम प्रशासन रसूखदारों के चंगुल से यह जमीन बचा पाता है या भू-माफियाओं के खेल में जिम्मेदारों के हाथ काले होते हैं।

नगर निगम की जमीन में ऐसे हुआ खेल
-वार्ड क्रमांक 27 में माल रोड ठंडी सड़क मुरार बारादरी चौराहा स्थित यह जमीन मिसिल प्रारंभ से ही राजस्व खसरे में म्यूनिसिपाल्टी आबादी दर्ज होकर निगम की भूमि है। वर्ष 1979 से 2010 तक के राजस्व खसरों में भी यह निगम भूमि के रूप में दर्ज थी।
-नगर निगम परिषद में तत्कालीन पार्षद मुन्नालाल गोयल द्वारा प्रस्तावित और जयनारायण सगर द्वारा समर्थित प्रस्ताव 11 अक्टूबर 1999 में पारित हुआ था जिसमें इस भूमि पर बाउण्ड्रीवॉल का निर्णय लिया था। उस समय रामनिवास सिंह गुर्जर निगम सभापति (अध्यक्ष) थे।
-ठहराव पास होने के बाद भी निगम ने बाउण्ड्रीवॉल तो की नहीं बल्कि कुछ नेताओं-अधिकारियों के गठजोड़ के चलते एक नया खेल शुरू हुआ और श्री मोहनलाल सर्राफ चेरिटेबल ट्रस्ट, जिसके ट्रस्टी भाजपा नेता पारस जैन भी है, की ओर से अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ग्वालियर के न्यायालय में केस दायर कर बताया कि उन्होंने यह जमीन रजिस्टर्ड लीज डीड के जरिये मध्य भारतीय आर्य प्रतिनिधि सभा भोपाल से क्रय की है।
-अदालत में नगर निगम के वकीलों और अधिकारियों ने अधिक गंभीरता नही दिखाई जिससे 2009 में मोहनलाल सर्राफ चेरिटेबल ट्रस्ट के पक्ष में फैसला हो गया और निगम के हाथ से जमीन खिसक गई। इसी आधार पर ट्रस्ट ने जमीन पर अपना नामांतरण कराने का आवेदन निगम में लगाया।
-मामला पकड़ में आने के बाद निगम ने नामांतरण पर कार्रवाई नहीं की। इस पर ट्रस्ट की ओर से 2013 में हाई कोर्ट में याचिका दायर की। अदालत ने विधिवत रूप से नामांतरण का आदेश नगर निगम को दिया। यहां यह बात विशेष रही कि हाई कोर्ट में भी निगम की ओर से गंभीरता नहीं दिखाई गई।
-दस साल पुराना यह मामला जैसे ही निगमायुक्त हर्ष सिंह के संज्ञान में आया तो उन्होंने साहसिक निर्णय लेते हुए नामांतरण का आवेदन निरस्त कर दिया और जिला न्यायालय के 2009 के आदेश के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील के लिए निगम के विधि सलाहकार कमल जैन से राय ली।
-एडवोकेट कमल जैन ने भी पटवारी रिपोर्ट और पुराने खसरों व अन्य दस्तावेज देख इसे निगम की भूमि माना और हाई कोर्ट में अपील की अनुशंसा की। लेकिन आश्चर्य यह रहा कि कमल जैन ने मार्च में ही यह अनुशंसा कर दी थी लेकिन निगम के जिम्मेदार अधिकारी इसे दबाकर बैठे रहे।
-जब निगमायुक्त हर्ष सिंह के संज्ञान में यह मामला आया तब उन्होंने विधि अधिकारी अनूप लिटोरिया को इस मामले में जल्द अपील फाइल करने की सख्त हिदायत दी। अब देखना है कि निगम प्रशासन इस मामले में हाई कोर्ट में कितनी गंभीरता दिखाता। वे निगम की 35 करोड़ की जमीन बचा पाते हैं या नेताओं के आगे बौने रहकर सरकारी संपत्ति को खुले आम लुटवाते है।
इनका कहना है
राजस्व खसरे में मिसिल प्रारंभ से ही सर्वे क्रमांक 2912 की जमीन म्यूनिसिपाल्टी ग्वालियर के नाम दर्ज है। ट्रस्ट की ओर से प्रस्तुत नामांतरण का आवेदन निरस्त कर दिया है। जिला न्यायालय के आदेश के विरुद्ध हाई कोर्ट में अपील प्रस्तुत करने के आदेश विधि अधिकारी को दिये हैं।
हर्ष सिंह, आयुक्त नगर निगम












