मामला ग्राम केदारपुर के सर्वे क्रमांक 482 की सरकारी जमीन का
हरीश चन्द्रा, ग्वालियर।
सरकार की करोड़ों रुपए कीमत की सरकारी जमीनों को माफियाओं को सौंपने में न केवल सरकारी वकील बल्कि कलेक्टर और उनके अधीनस्थ अधिकारी तक शामिल हैं। ऐसा ही करीब 100 करोड़ रुपए कीमत की सरकारी जमीन को निजी हाथों में सौंपने का पर्दाफास हुआ है। ग्वालियर के शहर लश्कर सिटी सेंटर के ग्राम केदारपुर( कैंसर हॉस्पिटल के नीचे शिवपुरी-लिंक रोड में सर्वे क्रमांक 482 की 10 बीघा 10 बिस्वा चरनोई भूमि (सरकारी जमीन) सरकारी वकील और कलेक्टर की लापरवाही से कॉलोनाइजरों के नाम हो गई। फर्जी डिक्री से जमीन बेचने वाले तीनों आरोपी भी पिछले दिनों न्यायालय से बरी हो गए। इसी माह 13 मई को न्यायालय द्वारा दिये गए फैसले की अवधि में भी लोक अभियोजक(शासकीय वकील) के रूप में विजय कुमार शर्मा ही थे जबकि उनके अधीन अपर लोक अभियोजक घनश्याम मंगल पैरवी कर रहे थे। इस मामले की शिकायत आरटीआई कार्यकर्ता संकेत साहू ने मुख्यमंत्री को कर दी है।

यह है पूरी कहानी-शिकायत का सार
-ग्राम केदारपुर के सर्वे नंबर 482 मिसिल बंदोबस्त सम्वत 1997 (वर्ष 1940) के अनुसार 10 बीघा 10 विस्वा चरनोई की शासकीय भूमि दर्ज थी। जमीन को हड़पने के लिए आरोपीगण महादेवी गुर्जर पत्नी स्व. उम्मीद सिंह गुर्जर, भारत सिंह गुर्जर पुत्र जर्दान सिंह गुर्जर एवं वृन्दावन सिंह पुत्र जर्दान सिंह गुर्जर निवासीगण छोटी मड़ैया केदारपुर थाना झाँसी रोड ने न्यायालय प्रथम अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश वर्ग – 2 ग्वालियर एके गोयनर के फर्जी हस्ताक्षर से फर्जी एवं कूटरचित आदेश और डिक्री तैयार की। इसे कॉलोनाइजर मनीष वर्मा पुत्र वृषभान सिंह वर्मा निवासी गोविंदपुरी सिटी सेंटर जिला ग्वालियर ने तैयार किया था। बाद में उक्त भूमि को मनीष वर्मा ने स्वयं खरीद लिया था, जिसके संबंध में 31 मई 2005 को रजिस्ट्री भी करा ली थी।
-तत्कालीन जिला एवं सत्र न्यायाधीश रेनू शर्मा ने इस प्रकरण की जांच कराई तो डिक्री को फर्जी पाया। इस पर न्यायाधीश ने तत्कालीन कलेक्टर राकेश श्रीवास्तव को 24 जनवरी 2006 को पत्र भेजा जिसमें अवगत कराया कि न्यायाधीश एके गोयनार प्रथम अतिरिक्त सीजे-2 ग्वालियर के पद पर पदस्थ ही नहीं थे बल्कि उनका पदनाम नवम व्यवहार न्यायाधीश वर्ग-2 ग्वालियर था l
-न्यायालय के आदेश की जो प्रतिलिपि को 22 मार्च 1997 को प्रमाणित होकर देना बताया है जबकि 22 मार्च 97 को अवकाश था। जिला न्यायालय के अभिलेखागार में भी उक्त प्रकरण का रिकॉर्ड था ही नहीं फिर फोटो कॉपी कैसे जारी हो गई। न्यायाधीश ने यह भी लिखा है कि उपरोक्त समस्त तथ्यों से स्पष्ट होता हैं कि प्रकरण क्रमांक 69-ए / 87 जरदान सिंह आदि विरुद्ध म.प्र.शासन में 11 फरवरी 1992 को न्यायालय प्रथम अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश वर्ग- 2 एकेगोयनार द्वारा कोई आदेश ही पारित नहीं किया गया हैं l न्यायाधीश श्रीमती रेनू शर्मा ने स्पष्ट लिखा है कि प्रथम दृष्टया कूटरचित दस्तावेज प्रतीत होता हैं, जिसका उपयोग न्यायिक कार्यवाही में करते हुए अवैध लाभ प्राप्त करते हुए शासन के समक्ष कूटरचित दस्तावेज प्रस्तुत कर नामांकन कराने के लिए कार्यवाही की गई थी l यह एक गंभीर प्रकरण हैं जिनके संबंध में क़ानूनी कार्यवाही तत्काल की जाना अपेक्षित हैं। अत: आप इस संबंध में दोषी के विरुद्ध तत्काल कार्यवाही कर इस कार्यालय को अवगत कराएं। इतना ही नहीं, श्रीमती शर्मा ने यह भी संदेह व्यक्त किया है कि इस कूटरचित दस्तावेज तैयार करने में कहीं न्यायालय के ही कर्मचारी तो शामिल नहीं है, इसकी भी जांच करना जरूरी है।
-श्रीमती रेनू शर्मा ने इस फर्जीवाड़े के संबंध में जब कलेक्टर को पत्र लिखा तब कलेक्टर ने तत्कालीन तहसीलदार को कार्रवाई के निर्देश दिये तब जाकर उपाध्याय ने थाना झांसी रोड में 15 फरवरी 2006 को महादेवी गुर्जर पत्नी स्व. उम्मीद सिंह गुर्जर, भारत सिंह गुर्जर पुत्र जर्दान सिंह गुर्जर एवं वृन्दावन सिंह पुत्र जर्दान सिंह गुर्जर के खिलाफ धोखाधड़ी का मामला दर्ज कराया। पुलिस ने तीनों आरोपियों को गिरफ्तार भी कर लिया था। लेकिन इस मामले में न्यायालय की ओर से वर्ष 2018 से 2023 के बीच कलेक्टर ग्वालियर, थाना प्रभारी थाना झाँसी रोड , पुलिस अधीक्षक, पुलिस महानिरीक्षक ग्वालियर जोन को कई बार पत्र लिखे गए कि 11 फरवरी 1992 के न्यायालय को जो फर्जी डिक्री और दस्तावेज तैयार किये गये हैं उसकी असल प्रति अभियोजन द्वारा साक्ष्य में प्रस्तुत नही की जा रही है। आखिर इसी माह 13 मई श्री रवि झरोला सप्तम अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय की ओर से सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया। इस तरह करीब 100 करोड़ रूपए कीमत की सरकारी जमीन फर्जी डिक्री व दस्तावेज के विवादों के बीच मनीष वर्मा व अन्य की हो गई। इस मामले में अब आरटीआई कार्यकर्ता संकेत साहू ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सरकारी वकील विजय शर्मा, अपर लोक अभियोजक के साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और अदालत के इस फैसले के खिलाफ ऊपर की अदालत में अपील करने की मांग की है।












