(‎विचार मंथन) बिना चर्चा संसद सत्र की समाप्ति 

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संसद का बजट सत्र बिना चर्चा के समाप्त हो गया। अडानी का भूत दोनों सदनों में छाया रहा। पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी अपनी बातों पर अड़े रहे। सरकार ने भी अपनी तरफ से विपक्ष से बात करने की कोई पहल नहीं की।

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में समन्वय बनाने की कोशिश लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने भी की हो, ऐसा दिखता नहीं है। सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी से माफी मांगने की बात कहकर सदन को नहीं चलने दिया। वहीं विपक्ष ने हिंडन बर्ग की रिपोर्ट और अडानी मामले में जेपीसी गठन करने की मांग को लेकर सदन को नहीं चलने दिया। आजादी के 75 वर्ष पूर्ण होने पर स्वतंत्रता का अमृत काल मनाया जा रहा है। इस अमृत काल में सरकार ने सदन को चलाने में स्वयं व्यवधान पैदा किया। सत्ता पक्ष का यह रूप पहली बार देखने को मिला।

लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति निर्वाचन के बाद सभी निर्वाचित प्रतिनिधियों के संरक्षक होते हैं। पक्ष और विपक्ष दोनों उनके लिए समान अधिकारिता रखते हैं। सदन की 75 साल पुरानी परंपराएं भी हैं। विपक्ष हमेशा अल्पमत में होता है। सत्ता पक्ष के पास बहुमत होता है। सत्ता पक्ष की सदन चलाने की जिम्मेदारी मानी जाती है।

विपक्ष हमेशा अल्पमत में होता है। इसलिए उसे संरक्षण की जरूरत होती है। जब सदन के अंदर ऐसी स्थिति बनती है। तब सरकार की ओर से संसदीय कार्य मंत्री विपक्ष के साथ चर्चा करते हैं। दोनों ही पक्ष एक दूसरे से बात करने तैयार ना हो, ऐसी स्थिति में अध्यक्ष की भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण हो जाती है।

आसंदी पक्ष और विपक्ष को बुलाकर बीच का रास्ता निकालती है। सरकार को सहमत कराने का काम भी अध्यक्ष को करना होता है। बहरहाल यह सत्र बिना किसी चर्चा की समाप्त हो गया। सरकार ने बिना चर्चा के बजट पास करा लिया। बिना चर्चा के बहुत सारे अध्यादेश और कानून भी पास हो गए। सरकार ने अपने काम किसी भी तरीके से सदन मे करा लिए, सरकार का कानूनी पक्ष पूरा हो गया,लेकिन सदन और लोकतंत्र की जो मर्यादायें थी। वह पूरी तरह से टूट गई हैं। बिना चर्चा के यह जो कार्यवाही हुई हैं। उन्हें कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता है।

आसंदी सत्ता पक्ष के दबाव में बनी रही,गतिरोध नहीं टूट पाने से आसंदी के प्रति पक्ष और विपक्ष का जो विश्वास होता था। वह भी इस सत्र में टूट गया। संसद के अंदर कम, संसद के बाहर जाकर विपक्ष ने अपनी लड़ाई लड़ी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही सदन के बाहर जिस तरह से एक दूसरे के सामने धरना प्रदर्शन और आयोजन कर रहे हैं। वह शक्ति प्रदर्शन धीरे-धीरे गैंगवार के रूप में परिणित होता जा रहा है। इससे लोकतंत्र, संविधान और सदन की मर्यादा खत्म होती नजर आ रही है।

अब तो लोग चर्चाओं में यह भी कहने लगे हैं, पढ़े लिखे और गुंडों के बीच में अंतर कर पाना मुश्किल हो रहा है। सदन के अंदर जब पक्ष और विपक्ष बात करने के लिए तैयार नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या अब सड़क पर आकर फैसला करेंगे। इसकी भी लोगों के बीच में चर्चाएं होने लगी हैं। मीडिया में भी जिस तरह से सत्ता पक्ष को प्रमुखता मिल रही है। विपक्ष और बुनियादी मुद्दे मीडिया से गायब होते जा रहे हैं। उसकी कसक अब जनता के बीच में भी महसूस की जाने लगी है। अब सोशल मीडिया और गोदी मीडिया की बातें होने लगी हैं। जिस तरह से रोजमर्रा के सामान में मूल्य वृद्धि हो रही है। आम जनता काजीवन दुश्वार होता जा रहा है।

मीडिया और सत्ता से आम जनता के सरोकार दूर होते जा रहे हैं। उसका असर अभी जनता के बीच में आपस की बातचीत के रूप में दिखने लगा है। पीड़ित पक्ष अभी विरोध प्रदर्शन के रूप में सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश करता है। लेकिन उनका कोई निराकरण नहीं हो पाने से, अब जनता में भी निराशा और गुस्सा दोनों ही देखने को मिल रहा है। जिसे वर्तमान संदर्भ में बेहतर नहीं कहा जा सकता है। यह सत्तापक्ष की।

असंवेदन शीलता को दर्शाता है। विपक्ष का हमेशा से काम रहा है,कि वह सरकार के वह मुद्दे जो जनता की राय से जुड़े होते हैं। उन्हें सामने लाकर जनता की राय सदन में लाये। सत्तापक्ष,जनता के आंदोलनों प्रदर्शन के प्रति संवेदनशील ना हो, तो यह स्थिति देश हित में नहीं हो सकती है। सत्ता पक्ष ने यह मान लिया है, कि यदि वह चुनाव जीत रहे हैं। तो वह जो कुछ कर रहे हैं,वह सही है। फिर नियम कायदे कानून की कोई जरूरत नहीं है। सरकार जो कर रही है, वह सही है। चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक दल लोकलुभावन घोषणाएं कर चुनाव जीत रहे हैं। सौगात एक हद तक पूरी की जा सकती हैं। इच्छाएं असीम हैं, जो निरंतर दिन दूनी और रात चौगुनी गति से बढ़ती हैं।

इच्छाएं सरकारें आम जनमानस की बढ़ाती जा रही है। जन्म लेने से मृत्यु के बीच के सारे खर्चे सरकार उठाने का दंभ भर रही है। जो काम भगवान नहीं कर सके, वह काम हमारी सरकारें कर रही हैं भारी टैक्स और भारी कर्ज के बाद कब तक जनमानस की इच्छाओं ओर उनकी आशाओं को पूरा किया जा सकता है?यह ज्यादा समय के लिए संभव नहीं है। राजनीतिक दलों को इस पर भी विचार करना चाहिए। कर्नाटक विधानसभा मे पक्ष और विपक्ष अपनी पूरी ताकत चुनाव जीतने में लगा रहा है। विपक्ष ने भी यह जान लिया है, कि चुनाव जीतना ही उसके अस्तित्व के लिए जरूरी है।

सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही नैतिक और अनैतिक तरीके से चुनाव जीतने के प्रयास में जुट गए हैं। सदन में जिस तरह से विपक्ष की एकता हुई है। यह विपक्षी एकता अब चुनाव में भी दिखेगी। अडानी और जेपीसी मामले में पूरा विपक्ष एकजुट हो गया। जिस तरह से राहुल गांधी की सदस्यता लोकसभा से समाप्त की गई। उसको अदालती जामा पहनाया गया। तुरंत मकान खाली करने का नोटिस दिया गया।

उसके बाद विपक्ष उग्र हो गया है। कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में इसकी परीक्षा हो जाएगी। चुनाव जीतने और हारने से यदि लोकतंत्र जीवित रहने वाला हो सकता होता, तो विपक्ष, कायदे- कानून इत्यादि की कोई जरूरत ही नहीं होती। ना ही इतने बड़े संविधान की किताब की जरूरत होती। ना न्यायालयों की जरूरत होती। जिस तरीके से धार्मिक उन्माद फैलाकर 80:20 का जो खेल खेला जा रहा है। वह बड़ा चिंताजनक होता जा रहा है।

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