धर्म का स्वरूप कभी नहीं बदलता, धर्म आपके आचरण से रक्षित होता है -प्रो.राम नक्षत्र प्रसाद

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जेयू: जीवाजी विश्वविद्यालय में वैश्विक संदर्भ में बौद्ध धर्म की सार्थकता पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित

ग्वालियर।

वैश्विक संदर्भ में बौद्ध धर्म की सार्थकता पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन जीवाजी विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा किया गया| राष्ट्रीय सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य आधुनिक विश्व में बौद्ध धर्म की सार्थकता का विश्लेषण तथा निर्धारित मापदंडों की अंतर्दृष्टि का समालोकन करना था।बौद्ध धर्म कला एवं आर्किटेक्ट, भारतीय संस्कृति, बौद्ध धर्म का सामाजिक समाज पर प्रभाव,बौद्ध साहित्य ,बौद्ध चित्रकला, बौद्ध दर्शन, बौद्ध ध्यान तकनीक , बौद्ध परंम्पराएं और रीतियां, बौद्ध पर्यटन स्थल आदि उपविषयों के संदर्भ में बौद्ध धर्म के सार्वभौमिक परिपेक्ष्य को समेटे इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश के लगभग 16 से अधिक राज्यों के शोधकर्ता, विषय विशेषज्ञ, शिक्षाविदों ने भाग लिया।

संगोष्ठी में में मुख्य अतिथि प्रो.राम नक्षत्र प्रसाद तथा अध्यक्षता जेयू के कुलपति प्रो.अविनाश तिवारी ने की।मुख्य वक्ता के रूप में मगध विश्वविद्यालय के प्रो.मुकेश कुमार तथा विशिष्ट अतिथि अरुण सिंह चौहान उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण कर किया। तत्पश्चात छात्राओं द्वारा सरस्वती वंदना का गायन किया गया।प्रो.एसके द्विवेदी द्वारा स्वागत भाषण दिया गया। कार्यक्रम के दौरान स्मारिका का विमोचन किया गया साथ ही अतिथियों को शॉल श्रीफल भेंट कर सम्मानित किया गया।मुख्य अतिथि प्रो.राम नक्षत्र प्रसाद ने बौद्ध धर्म की वर्तमान समाज में प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि आज समाज में विलुप्त होते नैतिक मूल्यों की पुनर्स्थापना की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि धर्म का स्वरूप कभी नहीं बदलता धर्म आपके आचरण से रक्षित होता है। अपनी शक्ति का प्रयोग विश्व कल्याण के लिए करना चाहिए न कि अपने जीविकोपार्जन के लिए।वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो.तिवारी ने कहा कि प्रातः काल के समय में प्रत्येक दिन दो घंटे मौन रहकर यह सोच लें कि पिछले दिन हमने ऐसा क्या किया जो नहीं करना चाहिए था वही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने कहा कि मैं और मेरे शब्द को त्याग दें और हम और हमारे शब्द का प्रयोग करें सारे धर्म आपके साथ हो जाएंगे।बुद्ध के दिखाएं मार्गों पर प्रत्येक व्यक्ति को चलने की आवश्यकता है तभी एक स्वस्थ, संस्कारित समाज का स्वप्न देख सकेंगे। अरूण सिंह चौहान ने कहा कि आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है बुद्ध अहिंसा की बात करते हैं। कोई भी समाज तब तक आगे नहीं बढ़ सकता जब तक वह अहिंसा के मार्ग पर न चले। मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित प्रो.मुकेश कुमार ने बौद्ध धर्म की विश्व व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज विश्व में बौद्ध धर्म का प्रसार उनके सिद्धांतों शिक्षाओं के विकसित स्वरूप के कारण है।सम्मेलन में लगभग बौद्ध धर्म के सार्वभौमिक परिप्रेक्ष्य पर 30 शोधार्थियों ने शोध पत्र पढ़ें। कार्यक्रम का संचालन आस्था तोमर व स्मृति ने किया व आभार व्यक्त प्रो.शांतिदेव सिसौदिया ने किया।इस मौके पर प्रो.जेएन गौतम,प्रो.जीबीकेएस प्रसाद,प्रो.हेमंत शर्मा,प्रो.मुकुल तेलंग, प्रो.एमके गुप्ता, प्रो.हरेंद्र शर्मा, डॉ.नवनीत गरूड़, डॉ.स्वर्णा परमार सहित छात्र एवं छात्राएं उपस्थित रहे।

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