डॉ. अनुराधा गुप्ता की याचिका पर जस्टिस जीएस आहलूवालिया की अदालत फैसला, प्रभावित अधिकारियों, कर्मचारियों ने तत्काल प्रभाव से काम किया बंद, सकते में शासन-प्रशासन
हरीश चन्द्र, बिल्लू बादशाह
ग्वालियर नगर निगम आयुक्त आईएएस संघ प्रिय सहित चार अपर आयुक्त, उपायुक्त, कार्यालय अधीक्षक सहित नगर निगम में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ 61 अधिकरियों, कर्मचारियों की पोस्टिंग को ग्वालियर हाई कोर्ट ने अवैध करार दिया है। निगमायुक्त को 15 दिन का समय दिया है जबकि शेष अधिकारियों, कर्मचारियों को तत्काल काम बंद करने के आदेश देते हुए मूल विभाग भेजने का आदेश जारी किया है। जस्टिस जीएस आहलूवालिया की अदालत का मप्र के लिए यह ऐतिहासिक फैसला हैं। प्रभावित अफसरों ने मंगलावार से ही काम बंद करते हुए फाइलों पर हस्ताक्षर करना बंद कर दिया है। जिस समय यह आदेश आया उस समय निगमायुक्त संघ प्रिय टाइम लिमिट की बैठक ले रहे थे। आदेश आते ही अफसरों की चेहरे ही हवाइयां उड़ गई। लंच बाद निगमायुक्त सहित कई अधिकारी दफ्तर नहीं पहुंचे। इस आदेश ने प्रदेशभर में खलबली मचा दी है। पशु चिकित्सक डॉ. अनुज शर्मा की निगम में प्रतिनियुक्ति के विरोध में डॉ. अनुराधा गुप्ता ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई थी। उस पर यह फैसला आया है।
आठ माह में भरना होंगे पद
नगर निगम ग्वालियर में राज्य प्रशासनिक सेवा सहित 61 अधिकारियों, कर्मचारियों के स्थानांतरण और प्रतिनियुक्ति निरस्त कर दी गई है। इन्हें तुरंत अपने मूल विभाग में रिपोर्ट करने का आदेश दिया गया है। कोर्ट ने नगर निगम प्रशासन को निर्देशित किया गया है कि वे खाली पड़े पदों को नियमित नियुक्ति के माध्यम से आठ माह के अंदर भरने की प्रक्रिया शुरु करें। आयुक्त नगर निगम ग्वालियर को यह स्वतंत्रता दी गई है कि यदि किसी कर्मचारी को तत्काल हटाने से नगर निगम के कामकाज में समस्या आ सकती है, तो वे विशेष कारण बताकर उसे आठ माह की अवधि तक अपने पद पर बनाएं रख सकते हैं। हालांकि, इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और आयुक्त को उन कर्मचारियों की सूची न्यायालय के प्रधान रजिस्ट्रार को सौंपनी होगी, जिनके बनाए रखने के कारण स्पष्ट किए जाएंगे। यह कदम नगर निगम की कार्यक्षमता सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है ताकि प्रशासनिक प्रक्रिया में बाधा न आए और नियमित नियुक्ति के जरिए स्थिरता लाई जा सके।
प्रदेश के सभी नगर निगम के आयुक्तों की चिंता बढ़ी
नगर निगम में कमिश्नर की पोस्टिंग करते समय धारा 54 का उल्लेख करना होता है। दिलचस्प यह है कि प्रदेश के किसी भी नगर निगम कमिश्नर की नियुक्ति में इस धारा का उल्लेख नहीं किया गया है। कोर्ट ने भले ही ग्वालियर कमिश्नर संघ प्रिय की पोस्टिंग अवैध बताई हो, मगर यह फैसला सभी निगमों पर लागू होगा। ऐसे में सरकार को या तो वर्तमान कमिश्नरों के लिए नए सिरे से धारा 54 का जिक्र करते हुए आदेश जारी करना होंगे, या फिर नए सिरे से तबादले करके अपडेट आदेश जारी करने होंगे।
इनकी प्रतिनियुक्ति कर दी निरस्त
निगमायुक्त संघ प्रिय, अपर आयुक्त (वित्त) राजनी शुक्ला, अपर आयुक्त विजय राज, मुनीष सिकरवार, अनिल कुमार दुबे के अलावा पशु चिकित्सक दिनेश दीक्षित, उपायुक्त सुनील कुमार चौहान, अमर सत्य गुप्ता, संतोष शर्मा, वैभव श्रीवास्तव, भानु प्रताप सिंह तोमर, सालिनी सिंह, पूजा मेहकाली, आशीष राजपूत, अशोक कुमार गुप्ता, विशाल गर्ग, गिरिश्मा आर्य, तनुजा वर्मा, रवि गोड़िया, सुरुची बंसल, अनिल चौहान, अजीत जैन, वर्षा मिश्रा, राजेश खरे, प्रमोद पाल, धर्मेंद्र धाकड़, जगन अग्रवाल, स्नेहलता परमार, दिनेश जाटव, सतेन्द्र सिंह, राहुल, अभिषेक सिंह भदौरिया, रेनू तोमर, राजकुमार कोष्ठा, रुपाली आर्य, प्रशांत राव, राजेंद्र सिंह विक्रम, धर्मेंद्र सिंह परमार, दीपेंद्र सेंगर, ऋतु अग्रवाल, सचिन सविता( निगमायुक्त के निज सहायक), अंकित शर्मा, शीतल डंडोतिया, विवेक त्यागी, जितेंद्र सिंह राजावत, महेश प्रताप सिंह सिकरवार, भूपेंद्र सासोडे , हेमंत कुशवाह, जितेंद्र सिंह बघेल, रमेंद्र सिंह गुर्जर, बृजेंद्र सिंह किरार, निकिता शर्मा, अभिषेक शर्मा, विवेक श्रीवास्तव, सालिनी गुप्ता, रुचि यादव, सपना चौहान, सोनाली पाराशर, प्रियंका द्विवेदी, संदीप मिश्रा, कुलदीप पाराशर।
अपर आयुक्त दुबे पर चलेगा कंटेम्ट ऑफ कोर्ट
इस याचिका में सबसे ज्यादा झटका अपर आयुक्त अनिल कुमार दुबे को लगा है। अदालत में उन्होंने गलत जानकारी दी थी, यह पकड़ में आ गई थी। अदालत ने दुबे पर कंटेम्ट ऑफ कोर्ट का मुकदमा चलाने और डिपार्टमेंटल इंक्वायरी गठित करने का भी आदेश दिया है। यह याचिका पशु चिकित्सक डॉ. अनुज शर्मा की नगर निगम में प्रतिनियुक्ति के विरोध में लगाई गई थी। डॉ. दिनेश दीक्षित भी पशु चिकित्सक थे जो प्रतिनियुक्ति पर नगर निगम में उपायुक्त बनकर आए थे। जस्टिस जीएस आहलुवालिया ने इस मामले को गंभीरता से लिया और निगम में प्रतिनियुक्ति पर जमे सभी अधिकारियों, कर्मचारियों की सूची मांगी थी। हर रोज याचिका पर सुनवाई हुई थी। हालांकि सुनवाई के दौरान ही दोनों पशु चिकित्सकों को उनके मूल विभाग वापस भेज दिया गया का लेकिन अदालत की सख्ती से लग रहा था कि इसमें कोई बड़ा एतिहासिक फैसला होगा। आखिर वही हुआ।












