ग्वालियर – जिस पार्टी का उदय झूठ पर हुआ हो, जिस पार्टी ने झूठे वादों और लच्छेदार बातों को करके जनता को गुमराह किया हो, जिस पार्टी का प्रमुख झूठ बोलता हो, जो जनता को सिर्फ और सिर्फ बेवकूफ बनाता हो, जो पार्टी विधायकों की खरीद फरोख्त करके सत्ता हथियाने से गुरेज नहीं करती हो, ऐसी पार्टी सत्ता में रहने के लिए हर एक तरह का दांव चलने से परहेज नहीं करेगी. उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो जनता कितनी बदहाल हो जायेगी जो अच्छे दिन के इन्तज़ार में मर मर जी रही है.
याद रखिये, कि जिनका कोई उसूल नहीं होता उनका कोई भरोसा नहीं होता. मध्य प्रदेश में वर्ष 2018 में भाजपा को जनता ने पूरी तरह से नकार दिया था लेकिन कुछ को दौलत की लालच देकर अपनी तरफ मिलाया और जो लालच में नहीं आया उसको धमका कर भाजपा वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश में सत्ता पर काबिज हुई. पिछली बार विधायकों को खरीदकर भाजपा ने आपको आईना दिखाया कि लो तुम्हारे कांग्रेस को वोट देने से क्या होता है, हमने खरीद लिये विधायक और बना ली सरकार!
मध्य प्रदेश में जनता ने पिछले पांच सालों में भाजपा की नाकाम सरकार को सहा. पिछले पांच सालों में भाजपा किसी भी क्षेत्र में सफल प्रशासन नहीं दे सकी. बदहाल एक इन्सान की पुकार और परेशानी सुनने को आज कोई तैयार नहीं है. उन्हें तो चिन्ता है कि अपनी तिजोरी को किस तरह भरा जा सके.
आज हम सिर्फ दो मुद्दों पर चर्चा करेंगे.
मध्य प्रदेश की इस सरकार के लूट का एक नायाब खामोश तरीका जिसका हल्ला ही नहीं होता सुन कर आप चौंक जायेगें और अचंम्भित हो जायेगें. जहां हज़ारों करोड़ों रूपया रोज़ का जनता से लूटा जा रहा है, वो जगह है मध्य प्रदेश के टोल प्लाज़ा. टोल प्लाज़ा पर ट्रकों और वाहनों को बिना रसीद दिए हुए टोल प्लाजा से निकाल दिया जाता है. इस लूट का नज़ारा में आपको इस रसीद को दिखा कर करवा रहा हूँ. एक खाली ट्रक को टोल प्लाजा से पास कराने के लिए 1500/- और भरे हुए ट्रक को पास करने के लिए 3500/- तक की वसूली बिना रसीद दिए टोल प्लाजा कर रहा है और ये हर रोज़ का हजारों करोड़ रूपया किस की जेब में जा रहा है किसी को पता नहीं है
. ये लूट अगर रूक जाये और ईमानदारी से हर वाहन को पैसे की रसीद मिले तो ये गरीब जनता की भलाई के लिए खर्च किया जा सकता है लेकिन नहीं…हालात इतने बदतर है कि केन्द्रीय परिवहन मंत्री नितिन गड़करी को प्रदेश सरकार को लिखना पड़ा कि इस लूट को रोकिये. वो आपस में नूरा कुश्ती कर रहे हैं. इस लूट को रोकना ही नहीं चाहते हैं. अब आपके पास मौका है, इस लूट को आपको रोकना है
आज का दूसरा मुददा है:
कांग्रेस ने किसानों के हितों को सुरक्षित रखने के लिए पंचायती राज स्थापित किया था लेकिन मध्य प्रदेश में भाजपा सरकार ने पंचायती राज को पूरी तरह से पंगु बना दिया है यही नहीं इन्होंने सहकारिता आंदोलन को बर्बाद कर दिया है. परिणामस्वरूप गांव का विकास बुरी तरह प्रभावित हुआ है. ग्राम पंचायत के सचिव / रोजगार सहायकों पर ग्राम प्रधान का नियंत्रण नहीं है. अब आइये बात करते हैं BJP के उस नेता की, जिसके इस क्षेत्र से होते हुए और केंद्रीय कृषिमंत्री होते हुए भी कृषि और किसान बर्बाद हुए हैं.
नरेंद्र सिंह तोमर 2009 से 2014 तक मुरैना से, 2014 से 2019 तक ग्वालियर से और 2019 में फिर से मुरैना से चुने गए अर्थात् 15 वर्ष इस क्षेत्र के सांसद रहे और मोदी सरकार के दोनों कार्यकालों में केंद्रीय मंत्री रहे. सांसद के रूप में भी और केंद्रीय मंत्री के रूप में भी अपने क्षेत्र के लिए उनका कोई उल्लेखनीय काम नहीं दिखता है, चाहे यहाँ के किसानों की स्थिति में कोई सुधार हो, यहाँ किसी उद्योग की स्थापना हो या माफिया राज के ऊपर अंकुश लगाना हो.
सनद रहे कि वर्ष 2020 के अगस्त माह में देश में तीन काले किसान क़ानून केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के संरक्षण में बने और फिर साल भर बाद वापिस ले लिए गए थे. ये भी चर्चा का विषय रहा कि केंद्रीय कृषि मंत्री जी ने किसानों या किसान समूहों से न तो क़ानून बनने से पहले चर्चा की और न ही तब, जब आंदोलन करने से पूर्व किसान उनसे मिलने का समय माँगते रहे! बल्कि 18 सितम्बर 2020 को उन्होंने इन कानूनो के बारे में ट्विटर पर कहा कि “कुछ राजनीतिक दलों द्वारा झूठ फैलाकर, देश की जनता को गुमराह करने का असफल प्रयास किया जा रहा है। कृषि बिल 2020 पूरी तरह से किसान हितैषी और उनकी आय में वृद्धि करने के लिये उठाया गया मोदी सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम है”.
लेकिन इस मुद्दे पर नरेंद्र सिंह तोमर के झूठ, अकर्मण्यता और असंवेदनशीलता इसी वर्ष स्पष्ट रूप से तब सामने आए जब अगस्त 2023 में “द आर्टिकल 14’ और ‘द रिपोर्टर्स कलेक्टिव’ नामक दो मीडिया संस्थानों द्वारा ‘नीति आयोग’ के उस खेल का भांडा फोड़ किया, जिसमें अमेरिका से आए शरद मराठे ने टास्क फ़ोर्स बनाई और उसी के बनाये किसान क़ानूनों को अध्यादेश के ज़रिए लागू किया गया. यानि केंद्रीय कृषि मंत्री ने अपने ही देश के किसानों को अपनी ही छाया तले धोखा दिया! किसान क़ानून तो 19 नवम्बर 2021 को रद्द कर दिए गए थे, लेकिन सरकार के वायदे के मुताबिक़ आज भी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की गारंटी को लेकर कानून बनाए जाने का अब भी इंतजार है.
केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के कार्यकाल में मध्यप्रदेश के किसानों से सम्बंधित कुछ आँकड़ों की बानगी देखे:
• पिछले पांच सालों में मध्य प्रदेश में 1226 किसानों ने आत्महत्या की है.
• मध्य प्रदेश में हर तीसरे दिन एक किसान आत्महत्या कर रहा है. किसानों की आत्महत्या के ये आंकड़े बता रहे हैं कि मध्य प्रदेश में किसानों की स्थिति चिंताजनक है.
• कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने राज्यसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में 16 दिसंबर 2022 को किसानों की मासिक औसत आय के आंकड़े सदन के सामने प्रस्तुत किए थे, जिसके अनुसार किसानों की राष्ट्रीय मासिक औसत आय 10,218 रुपये है. जबकि मध्य प्रदेश में किसानों की मासिक औसत आय राष्ट्रीय औसत आय से काफी कम मात्र 8,339 रुपये मासिक है.
• आज मनरेगा की न्यूनतम मज़दूरी इतनी कम है कि कोई ग्रामीण मनरेगा में काम नहीं करना चाहता है. ग्राम पंचायतों में मनरेगा जैसी ग्रामीण विकास और जीविका की योजना के क्रियान्वयन को तमाम जटिलताओं से भर दिया गया है और मनरेगा का भुगतान कई-कई महीनों तक नहीं किया जा रहा है, जिससे ग्रामीण भूखा मर रहा है.
• सारे काम टाइड/अनटाइड में बांट दिए गये हैं जिस कारण ग्राम पंचायत के अन्य जरूरी उद्देश्यों और ग्राम प्रबन्धन की पूर्ति संभव नहीं हो पा रही है. ग्रामीण यांत्रिकी और लोक अभियांत्रिकी विभाग के CSR में अन्तर रखा गय है जबकि सारी निर्माण सामग्री GST के दायरे में है.
• ग्राम पंचायतों में गौशाला, कांजी हाउस, नलकूप, साफ-सफाई, विद्युत बिल, इण्टरनेट के लिए कोई धनराशि नहीं दी जा रही है. इस कारण ग्रामीणों का जीवन और ग्राम पंचायतें बदतर स्थिति में है.
• मध्यप्रदेश में 13 जिलों के 4 लाख किसान बासमती धान की खेती करते हैं, लेकिन जीआई टैग नहीं होने की वजह से इसे बासमती के तौर पर मान्यता नहीं है. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चावल की गुणवत्ता के आधार पर मध्य प्रदेश की बासमती के लिये जीआई टैग माँगा था. अपने ही संसदीय क्षेत्र के डबरा और भितरवार तक की 12 वर्षों पुरानी इस माँग पर केंद्रीय कृषि मंत्री एक्शन नहीं ले सके. वे जीआई टैग के लिए मध्य प्रदेश को हर संभव सहायता देने का आश्वासन तो देते रहे, लेकिन लगातार उठाई जाती इस माँग को स्वयं केंद्रीय कृषि मंत्री रहते हुए और यहाँ तक कि अपने गृह राज्य और गृह प्रदेश का विषय होते हुए भी लागू नहीं करा सके.
नरेंद्र सिंह तोमर के क्षेत्र में न गन्ने के किसानों को न्याय मिला, न बाजरे और सरसों के और न ही धान के किसानों को उनकी फसल के लिए GI टैग. मुरैना ज़िले के सहकारी शुगर कारख़ाने पर 2009 से धीरे धीरे ऋण की वृद्धि हुई और 2011 में 24 करोड़ रुपए का ऋण न चुका पाने के कारण बंद हो गया. 1971 से ये कारख़ाना इस क्षेत्र के लोगों को रोज़गार भी दे रहा था और सरकार को लाभ भी. किसान संगठनों ने मिलकर इस कारख़ाने को दोबारा चलाने की इच्छा शक्ति दिखाई और अपेक्स बैंक भी लगभग 50 करोड़ का ऋण देने तैयार था. अब सरकार इसके तीन हिस्से कर के कल पुर्ज़ों और मशीनों को स्क्रैप बता कर शायद कारपोरेट व्यापारियों को बेचने का सोच रही है. इन बीते वर्षों में कारख़ाने के कर्मचारियों के 18 करोड़ से ज़्यादा राशि का भुगतान भी सरकार ने नहीं किया. इसी क्षेत्र से आने वाले कृषि मंत्री जी को इस सब से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा.
इसी बिंदु पर ये भी याद रखने की ज़रूरत है कि नरेंद्र सिंह तोमर जब ग्वालियर लोकसभा से सांसद थे तब उन्होंने जयभान सिंह पवैया जी के पैतृक गांव चीनोर को गोद लिया था और एक आदर्श ग्राम विकसित करने का वादा किया था लेकिन आज भी वह गांव मूलभूत सुविधाओं से वंचित है.
आज भाजपा में गुटबाजी के चलते शह और मात का खेल चल रहा है. जब नरेंद्र सिंह तोमर पावर में आए तो उन्होंने अपने भरोसेमंद आदमी को ग्वालियर भाजपा का अध्यक्ष बनवा दिया और सिंधिया व सांसद शेजवलकर के अध्यक्ष का पता साफ कर दिया. थोड़ा गूढ़ अर्थों में देखें तो अब सिंधिया ने उन्हें प्रदेश संयोजक बनने के बाद विधानसभा का प्रत्याशी बनवाकर एक विधानसभा तक सीमित दिया है और उनको इस विधानसभा में उलझा दिया है, जिस कारण से वह प्रदेश भाजपा के संयोजक केवल नाम मात्र के बनकर रह गए हैं.
विधानसभा चुनाव के स्तर पर आ खड़े हुए केंद्रीय कृषि मंत्री इस घोषणा के बाद सकते में आ गये थे और 10 – 12 दिनों तक अपनी विधान सभा क्षेत्र में नहीं पहुँचे थे, जहां वैसे भी उनके पुत्र स्वयं के लिए ज़मीन बना रहे थे. लेकिन BJP संगठन के आदेश अनुसार अब चुनाव की तैयारी में हैं. उनके क्षेत्र की जनता को भली प्रकार मालूम है कि चुनाव जीत कर वे न तो उनके बीच रहने वाले हैं और न ही उनके मुद्दे उठाने वाले हैं. पहले भी ख़ुद को जिताने वाली जनता को भगवान भरोसे छोड़ कर दिल्ली की सत्ता में रमे हुए थे.
इसलिये साथियों, आज आपको फिर मौका मिला है, अपने वोट की क़ीमत जानने का. अपने ज़नप्रतिनिधियों को चुनते समय स्वयं के सरोकारों को ध्यान रखिये और अपने वोट की क़़ीमत पहचानिये और कांग्रेस को इतने बड़े बहुमत से आपको जिताना है, कि कोई आपको आईना नहीं दिखा सके.
हमारा वचन है कि काँग्रेस की सरकार बनने पर किसानों को गेहूं का समर्थन मूल्य 2600 रुपए और धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपए दिया जायेगा और फिर इसे बढ़ाकर 3000 रुपये तक ले ज़ाया जायेगा. पत्रकार साथियों से आग्रह है कि वे कांग्रेस के वचन पत्र के ‘पेज 3 से पेज 8’ तक किसानों के लिए कांग्रेस द्वारा प्लान किये गये कार्यों और योजनाओं का उल्लेख अवश्य करें और लाभार्थी वर्ग तक इस संवाद को पहुँचायें.












