ग्वालियर – मानव जीवन क मंडल के समान हैं, इसमें यदि द्रुगुण रूपी छेद हो गया तो डूब जाएगा और खुद अपने अधोपतन का कारण बनेगा। जहां संपत्ति का विवाद हो वहां महाभारत और जहां संपत्ति के लिए त्याग हो वहां रामायण होती है।
जो संपत्ति विवाद के बाद आती है वो दुख देती है, इसलिए जीवन मस्ती से जिओ अनावश्यक विवाद मत करो। यह विचार ऋषि सेवा समिति द्वारा सहयोग गार्डन तानसेन नगर में आयोजित श्रीमदभागवत कथा के दूसरे दिन राघव ऋषि ने व्यक्त किए।
उन्होंने कहा कि हमारा जीवन सिर्फ धन कमाने एवं पद प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए नहीं हैं, बल्कि जीवन का लक्ष्य भगवान की शरण में जाकर कर मुक्त हो जाना है। लोगों को अपने पद से इतना मोह होता है कि रिटायर होने के बाद भी वे भूतपूर्व लिखते हैं। जिंदा हो तो भूत क्यों साथ में लगाए हो।
भूतपूर्व नहीं अभूतपूर्व बनो। मनुष्य की आधी उम्र सोने में गुजर जाती है बाकी बची जीवन की हाय हाय में, न जीवन में कोई सत्कर्म में और न कोई अभिरुचि या लक्ष्य,ऐसा जीवन पशु के समान हैं। कथाएं मनुष्य को जीवन जीने का तरीका सिखाती हैं। ऋषि महाराज ने कहा कि दुख मनुष्य को सावधान करने के लिए आते हैं।
महाराज ने कहा कि जिस मनुष्य के स्वभाव और चरित्र से परिचत न हों, उसे स्पर्श नहीं करना चाहिए। स्पर्श करने से कुछ तत्व जरूर प्रविष्ट होता है। जो दूसरों का अपमान करता है, उसे कभी सम्मान नहीं मिलता है। जिस दिन कोई पाप हो जाए, उस दिन भोजन न करें, ताकि बार बार यह स्मरण रहे कि दोबारा ऐसा न हो।
दिनेश सिंह सिकरवार, रमेश सिंह, कुलदीप सिंह, राकेश सिंह जादौन, धर्मकांत शुक्ला, जितेेंद्र सिंह राजपूत, जसवंत किरार, सुनील किरार, हरिओम बघेल, राकेश भदौरिया, आनंद मोहन अग्रवाल, संतोष अग्रवाल, उमेश उप्पल, रामबाबू अग्रवाल, संजय शर्मा, अंबरीश गुप्ता, देवेंद्र तिवारी, हरियोम मिश्र, प्रमोद गर्ग बलवीर परमार प्रमुख रूप से मौजूद रहे।












