चहेती फर्म को टेंडर देने को उतावले नगर निगम के अधिकारियों ने टेंडर शर्तों को खूंटी पर टंगा
हरीश चन्द्र, ग्वालियर।
नगर निगम अफसरों ने वित्तीय अनियमितता के मामले में महापौर डॉ. शोभा सिकरवार को फंसाने का षड़यंत्र रच डाला। मामला सड़कों के बीच लगने वाले दिशा सूचक (गैंट्री) से जुड़ा है। निगम अधिकारियों ने एक ऐसी फर्म को टेंडर देने का उतावलापन किया है जिसके दस्तावेज ही फर्जीवाड़े के खुले सबूत दे रहे हैं। मामला तब और गंभीर हो गया है जब निगम में दो विधि विशेषज्ञ होने के बावजूद इस छोटे से मामले में अतिरिक्त महाधिवक्ता (एएजी) विवेक खेड़कर से राय ली गई।

देखें कैसे खेल खेला जा रहा–
1-चौथी बार गैंट्री का टेंडर निकाला जिसमें दो फर्म वत्सना टेक्नोलॉजी प्रा. लि. व मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. नामक फर्मों के टेंडर आए।
2- निर्धारित शर्तें पूरी न करने पर वत्सना नामक फर्म अपात्र पाई गई। दूसरी फर्म मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. को टेंडर देने का निगमायुक्त द्वारा नियम-शर्तों को खूंटी पर रख टेंडर देने का प्रयास किया जा रहा है।
अब देखिये मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. का खेल-
1- राजेन्द्र शर्मा नाम के व्यक्ति की दो फर्में हैं। पहली सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स और दूसरी है मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि.। दोनों फर्मों के जीएसटी यानी रजिस्ट्रेशन नंबर अलग-अलग हैं।
2- गैंट्री के लिए मैं. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. नामक फर्म ने टेंडर डाला है जबकि ग्वालियर नगर निगम में कई सालों से सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स फर्म यूनिपोल का काम कर रही है।
3-निर्धारित शर्तों के तहत फर्म को इस आशय का शपथ-पत्र देना था कि मेरे अथवा मेरी फर्म के ऊपर आज दिनांक तक ग्वालियर नगर निगम की विज्ञापन शाखा की कोई देय राशि बकाया नहीं है। मैं. सांवरिया सेठ प्रा. लि. ने यह शपथ-पत्र दिया ही नहीं फिर भी निगम अफसरों ने इस मामले में टेक्नीकल और फाइनेंसियल बिड खोल दी और इस फर्म को पात्र घोषित कर दिया।
4-टेंडर में शर्तों का पत्रक रहता है। इसे पर फर्म द्वारा अटेस्टेड कर टेंडर में लगाया जाता है। इस फर्म ने यह पत्रक स्व-हस्ताक्षरित संलग्न ही नहीं किया फिर भी अफसरों ने फर्म को पात्र घोषित कर दिया।
5-मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा.लि. फर्म ने भोपाल की एक फर्म भोपाल सिटी लिंक लिमिटेड द्वारा जारी अनुभव प्रमाण-पत्र लगाया है। इसमें बड़े स्तर की गड़बड़ी खुलेआम देखी जा सकती है। भोपाल की फर्म का एग्रीमेंट सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स नामक फर्म से है, मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा.लि. से नहीं। जब प्रा. लि. फर्म से एग्रीमेंट ही नहीं फिर उससे कार्यानुभव प्रमाण-पत्र कैसे जारी कर दिया।
6- भोपाल की फर्म का एग्रीमेंट सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स नामक फर्म से 6 फरवरी 2021 को हुआ है, जबकि मैं. सांवरिया सेठ एटवर्टाजर्स प्रा. लि. नामक फर्म का जन्म 9 माह बाद यानि 2 नवंबर 2021 को हुआ। अर्थात प्रा. लि. नामक फर्म का भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ कॉर्पोरेट अफेयर्स से रजिस्ट्रेशन हुआ। समझ सकते हैं कि मैं. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. अस्तित्व में ही नहीं थी, फिर भोपाल की फर्म ने उसे अनुभव प्रमाण-पत्र कैसे जारी कर दिया।
7-भोपाल की फर्म द्वारा जारी किए गए अनुभव प्रमाण-पत्र के लिए विधिक राय हेतु अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेड़कर को पत्र भेजा गया जबकि यह छोटा मामला निगम के ही दो विधि अधिकारी दे सकते हैं। जब विधि अधिकारी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो उन्हें वेतन क्यों दिया जा रहा है, निगम में उनकी उपयोगिता क्या रह गई है।
8- मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा.लि. ने सागर की फर्म सागर सिटी ट्रांसपोर्ट का LOA पत्र संलग्न किया गया है, प्रथम दृष्टया यह कूटरचित जान पड़ रहा है, क्योंकि फ़र्म का LOA पत्र 11 मई 2023 में जारी किया गया है, जबकि उसी पत्र में फाइनेंसियल बिड को 9 जून 2023 को खोलना बताया गया है। जब फाइनेंसियल बिड 9 जून 2023 को खोली गई है तो LOA 11 मई यानी एक माह पहले कैसे जारी किया जा सकता है। इस संबंध में निगम अधिकारियों ने सागर की फर्म से प्रमाणीकरण क्यों नहीं मांगा।
9- मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. ने टेंडर के दस्तावेजों में जो सील लगाई है वह सांवरिया सेठ एडवाइज़र की है न की मै. सांवरिया सेठ एडवर्टाजर्स प्रा. लि. की। इससे यह फ़र्ज़ी जान पड़ता है।
10- अतिरिक्त महाधिवक्ता विवेक खेड़कर ने 8 अप्रैल 2026 को विधिक राय। आखिर टेंडर देने को उतावले अधिकारियों ने आनन-फानन में 9 अप्रैल को फाइनेंशियल बिड खोल दी और उसी दिन महापौर डॉ. शोभा सिकरवार की अध्यक्षता में मेयर इन काउंसिल की बैठक थी। बैठका एजेण्डा चार दिन पहले ही फाइनल हो जाता है, इसलिए गैंट्री का मामला एजेण्डे में था, किंतु बिड खोलकर सीधे उसी दिन आयुक्त ने अतिरिक्त बिंदु के रूप में गैंट्री का मामला एमआईसी में प्रस्तुत कर दिया। हालांकि मामला पकड में आते ही महापौर ने उसे मंजूरी नहीं दी।
11- अधिकारियों के षड़यंत्र का एक और बड़ा मामला यह है कि टेंडर समिति के अध्यक्ष अपर आयुक्त मुनीष सिंह सिकरवार हैं। जबकि 9 अप्रैल को फाइनेंसियल बिड खोलने पर अपर आयुक्त प्रदीप तोमर ने अध्यक्ष के रूप में हस्ताक्षर किये हैं। 9 अप्रैल को श्री सिकरवार मेयर इन काउंसिल की बैठक में शामिल थे फिर उन्होंने टेंडर बिड पर हस्ताक्षर क्यों नहीं किए।
महापौर डॉ. शोभा सिकरवार और एमआईसी सदस्य अवधेश कौरव लगातार बिल्लू बादशाह की खबरों पर नजर गढ़ाए थे अन्यथा एमआईसी से मंजूरी मिल जाती जिससे महापौर सहित सभी सदस्य कटघरे में खड़े हो जाते।
इनका कहना है
गैंट्री के टेंडर में तमाम विसंगतियां हैं इसलिए उसे मंजूरी नहीं दी है। सभी कागजों की बारीकी से पड़ताल के बाद ही इस मामले में कोई निर्णय लिया जाएगा।
डॉ. शोभा सतीश सिंह सिकरवार, महापौर












