सरकारी वकीलों व अफसरों की गंभीर लापरवाहियों से शासन के हाथ से निकली करोडों की जमीन

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हरीश चंद्र, ग्वालियर।

जिला प्रशासन और सरकारी वकीलों की घोर लापरवाही और लचर पैरवी के कारण मध्य प्रदेश शासन को ग्वालियर में एक बहुत बड़ा झटका लगा है। शासकीय भूमि की रक्षा करने में नाकाम रहे सरकारी तंत्र के कारण शासन ग्राम मऊ की करीब 14.997 हेक्टेयर (लगभग 75 बीघा) बेशकीमती जमीन फिलहाल सरकार के साथ से निकल चुकी है, कोर्ट में सरकार की हार हो चुकी है। ग्वालियर के अठारहवें व्यवहार न्यायाधीश कनिष्ठ खण्ड (न्यायाधीश सुयश परनाम) की अदालत ने शासकीय दावों को खारिज करते हुए इस भूमि पर एक निजी व्यक्ति के मालिकाना हक पर मुहर लगा दी है। इस पूरे मामले में प्रतिवादी शासन के वकील विजय कुमार शर्मा, पटवारी कुलदीप सिंह चाहर सहित अन्य राजस्व अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, क्योंकि वह अदालत के सामने शासन का पक्ष मजबूती से रखने और जरूरी दस्तावेज पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहे।

पटवारी, आरआई की संदिग्ध भूमिका

इस मामले में प्रारंभिक पड़ताल में सामने आया है कि अपनी जमीन होने का दावा करने वाले धर्मवीर सिंह ने जो दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं वे सरकारी रिकॉर्ड से जारी नहीं हुए हैं। एक ऐसा भी दस्तावेज सामने आया है जो रविवार को सरकारी छुट्टी होने के दिन जारी होना बताया है। इन दस्तावेजों की जांच पटवारी व अन्य राजस्व अधिकारियों ने की ही नहीं। नायब तहसीलदार ने इस मामले में पटवारी कुलदीप सिंह चाहर की भूमिका पर संदेह जताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की है।

क्या है पूरा मामला

यह मामला व्यवहार प्रकरण क्रमांक 912ए/2019 से जुड़ा है। ग्राम विकमपुर, महाराजपुरा निवासी धर्मवीर सिंह लोधी ने म.प्र. शासन के खिलाफ एक दीवानी मुकदमा दायर किया था। वादी का दावा था कि ग्राम मऊ (पटवारी हल्का नंबर 54, तहसील व जिला ग्वालियर) स्थित सर्वे क्रमांक 414, 415, 416 और 417 (कुल रकबा 14.997 हेक्टेयर) की जमीन उसके दादा स्व. लक्ष्मण सिंह के नाम पर थी, जिसे बाद में राजस्व रिकॉर्ड में बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के ‘शासकीय भूमि’ दर्ज कर दिया गया। वादी ने वसीयत के आधार पर इस करोड़ों की जमीन पर अपना मालिकाना हक मांगा था।

सरकार का पक्ष रखने में लापरवाही

शासन की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि संवत् 1997 के रिकॉर्ड के अनुसार यह जमीन पहाड़ और ‘पड़ती कदीम’ (सरकारी) थी। लेकिन कोर्ट ने अपने आदेश में साफ लिखा कि सरकारी वकील वर्ष 1958 से लेकर वसीयत निष्पादन (2008) के बीच की अवधि का ऐसा कोई भी सारवान दस्तावेज या सबूत पेश नहीं कर सके, जिससे यह साबित हो कि इस दौरान जमीन पर शासन का स्वत्व था।

तहसीलदार के पुराने आदेश को चुनौती देने में नाकाम

वादी ने साल 1958 के एक तहसीलदार आदेश की प्रति (प्रदर्श पी-4) पेश की, जिसमें उसके दादा को ‘पक्का कृषक’ माना गया था। सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा कोर्ट में यह साबित करने या ऐसा कोई आदेश दिखाने में पूरी तरह फेल रहे कि उस तहसीलदार के आदेश को कभी निरस्त या अपास्त किया गया था।

बिना किसी आदेश के नाम बदलने का नहीं दे पाए स्पष्टीकरण

कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब सालों से राजस्व रिकॉर्ड में निजी नाम चल रहा था, तो उसे हटाकर ‘शासन’ का नाम किस सक्षम प्राधिकारी के आदेश पर दर्ज किया गया, इसका कोई भी लिखित आदेश या स्पष्टीकरण सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर पाए।

सरकारी डिफेंस में इस कदर बुनियादी कमियां और ढीलापन देखने के बाद, न्यायालय ने वादी धर्मवीर सिंह के पक्ष में फैसला सुनाते हुए मध्य प्रदेश शासन, उनके कर्मचारियों और एजेंटों को स्थाई निषेधाज्ञा द्वारा रोक दिया कि वे वादी को इस जमीन से बेदखल न करें।

जिला अदालत में भी खेल जारी, 3 बार के आदेश के बाद भी रिकॉर्ड छुपाया

सितंबर 2024 में सिविल कोर्ट से करारी शिकस्त खाने के बाद भी सरकारी वकील और राजस्व विभाग का अमला गहरी नींद से जागने को तैयार नहीं है। अब हालत यह है कि जिला न्यायालय में की गई अपील में कोर्ट द्वारा 3 बार (27 अप्रैल, 8 मई और 16 जून को) कड़े निर्देश देने के बावजूद जिम्मेदार अधिकारी और सरकारी वकील विजय कुमार शर्मा अदालत के सामने ‘मूल रिकॉर्ड’ पेश करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए हैं। अपील के दौरान शासन का दावा है कि विपक्षी धर्मवीर सिंह ने जो नकलें पेश की हैं, वे फर्जी हैं। लेकिन जालसाजी साबित करने के लिए कोर्ट में ‘मूल सरकारी रिकॉर्ड’ दिखाना अनिवार्य होता है। कोर्ट ने अब अंतिम चेतावनी के साथ अगली सुनवाई 7 जुलाई तय की है।

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